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Tuesday 15 February 2011

जीवनदायनी....


ये कैसी ममता है जिसमे आंचल की छावं नहीं,

मन कुंठित हो जाता है, ममत्व से विश्वास उठता नहीं !


जालिम दुनिया के डर से औलाद को दफ़न क्यूँ करती हो,


बन कर सिंघनी तुम क्यूँ नहीं ज़माने से लडती हो !


पलभर की ख़ुशी-सुकून की खातिर मर्यादा का हनन करती हो,

कृष्ण रूपी को यूँ जीते जी काल के हाथों में जतन करती हो !


खोकर सपूत को अपने क्या तुम पल-पल नहीं मरती हो,


फिर
क्यूँ तुम जीवनदायनी होकर जीवन-हरण करती हो !


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