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Tuesday, May 31, 2011

भ्रष्टाचार :Vs: भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार : क्या है, भ्रष्टाचार कैसा है, चारो तरफ सिर्फ लोग भ्रष्टाचार का विरोध कर रहें है, कौनसे भ्रष्टाचार का विरोध कर रहें हैं ? आईये इसे जानने का प्रयास करते हैं !

भ्रष्टाचार क्या है ?
भ्रष्टाचार शब्द के योग में दो शब्द है, भ्रष्ट और आचार ! भ्रष्ट का अर्थ है बुरा या बिगड़ा हुआ और आचार का अर्थ है आचरण ! भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ - वह आचरण जो किसी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो है ! (दुसरे शब्दों में कहें तो इन्सान के द्वारा किया गया वह कार्य जो व्यक्ति,समाज, देश और विश्व के लिए नुकसान दायक हो वो भ्रष्टाचार है !) हमारे देश में भ्रष्टाचार दिनों दिन सुरसा कि मुख कि भांति बढता ही जा रहा है, यह हमारे समाज और राष्ट्र के सभी अंगों को बहुत ही गंभीरता पूर्वक प्रभावित किये जा रह है ! राजनिति, समाज, धर्म, संस्कृति, साहित्य, दर्शन, व्यापार, उद्योग, कला, प्रशासन आदि में भ्रष्टाचार कि पैठ आज इतनी बढ़ चुकी है कि इससे मुक्ति मिलना बहुत कठिन लग रहा है ! चारो तरफ दुराचार, व्यभिचार, अनाचार आदि ये सभी भ्रष्टाचार के प्रति रूप हैं जिन्हें हम अलग-अलग नामो से जानते हैं लेकिन वास्तव में ये सभी भ्रष्टाचार कि ही जड़ें हैं ! इसलिए भ्रष्टाचार के कई नाम रूप हो गये हैं लेकिन उनके कार्य और प्रभाव लगभग सामान हैं या एक - दुसरे से मिलते-जुलते हैं !

भ्रष्टाचार के क्या कारण हो सकते हैं ?
यह सर्वविदत है, भ्रष्टाचार के मुख्य कारणों व्यापक असंतोष पहला कारण है ! जब किसी को कुछ आभाव होता है और उसे वह आभाव अधिक कष्ट देता है तो वह भ्रष्ट आचरण करने के लिए विवश हो जाता है ! भ्रष्टाचार का दूसरा कारण स्वार्थ सहित परस्पर असमानता है , यह असमानता चाहे आर्थिक हो , सामाजिक हो या सम्मान पद प्रतिष्ठा आदि में से जो भी हो ! जब एक व्यक्ति में मन में दुसरे व्यक्ति के लिए हीनता और जलन कि भावना उत्पन्न होती है तो इस बीमारी से शिकार हुआ व्यक्ति भ्रष्टाचार को अपनाने को बाध्य हो जाता है ! अन्याय और निष्पक्षता के अभाव में भी भ्रष्टाचार का जन्म होता है ! जब प्रशासन या समाज किसी व्यक्ति के प्रति अन्याय करता है , उसके प्रति निष्पक्ष नही हो पता है तब इस से प्रभावित हुआ व्यक्ति या वर्ग अपनी दुर्भावना को भ्रष्टाचार को उत्पन्न करने में लगा देता है ( उदाहरण के लिए किसी अच्छे खिलाडी को खेलने का मौका नहीं दिया जाता तो वो भ्रष्टाचार करने के लिए प्रेरित हो जाता है, या कम पैसा मिलने पर भी वो ऐसा कर सकता है)
ठीक इसी तरह से जातीय , साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता, भाषावाद, भाई-भातिजवाद (मतलब किसी एक वर्ग को फायदा दिलाने कि वजह से) के फलस्वरूप भ्रष्टाचार का जन्म होता है जिस से चोर बाज़ारी , सीनाजोरी, दलबदल , रिश्वतखोरी, बेईमानी, धोका-धडी अव्यवस्थाएं प्रकट होती है !
हमारे देश में बेरोजगारी और बढती हुयी जनसँख्या के असीमित होने के कारण महंगाई और भ्रष्टाचार को खूब बढ़ावा मिला है ! रिश्वत सिफारिश , अनुचित साधनों का प्रयोग, स्वर्थपरता, आदि के कारण ये समस्या दुगनी गति से बढ़ रही है ! बेरोजगारी कि वजह से युवा वर्ग शोर्टकट के चक्कर में अनैतिक कार्य में चले जाते हैं !

भ्रष्टाचार के कुपरिणाम स्वरुप समाज और राष्ट में व्यापक रूप से असमानता और अव्यवस्था का उदय होता है , इससे ठीक प्रकार से कोई भी कार्यपद्धति चल नहीं पाती है और सबके अन्दर भय , आक्रोश और चिंता कि लहरें उठने लगती है ! असमानता का मुख्य प्रभाव यह भी होता है कि यदि एक व्यक्ति या वर्ग बहुत प्रसन्ना है तो दूसरा वर्ग बहुत निराश और दुखी हो जाता है ! भ्रष्टाचार के वातावरण में ईमानदारी और सत्यता तो गायब हो ही जाते हैं और उनके स्थान पर केवल बेमानी और कपट का प्रचार और प्रसार होने लगता है इसलिए हम कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार का सिर्फ दुष्प्रभाव ही होता है और इसे दूर करना एक बड़ी चुनौती है ! भ्रष्टाचार के द्वारा दुष्प्रवित्तियों और दुष्चरित्रता को ही बढ़ावा मिलता है और इसे सचारित्रता और सदप्रवृति कि जड़े सूखने लगती हैं , यही कारण है कि भ्रष्टाचार कि राजनितक , आर्थिक , व्यापारिक , प्रशासनिक , और धार्मिक जड़े इतनी गहरी और मजबूत हो गयी है कि इन्हे उखाड़ना और इनके स्थान पर साफ-सुथरा वातावरण का निर्माण करना आज प्रत्येक राष्ट्र के लिए लोहे के चने चबाने के सामान कठिन है !
नकली सामन बेचना , खरीदना , वस्तुओं में मिलावट करते जाना , धर्म का नाम लेकर अधर्म का आश्रय ग्रहण करना , कुर्सीवाद का समर्थन करना और स्वार्थवश दलबदल करना , दोषी और अपराधी लोगों को घुस लेकर छोड़ देना उन पर क़ानूनी करवाई ना करना , रिश्वत लेकर निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करना , किसी पद कि प्राप्ति हेतु निश्चित सीमा में निर्धारण करके पैसे का लेन-देन , पैसे के मोह में आकर हत्या और लूटमार को अंजाम देना , प्रदर्शन , लूटपाट , चोरी , कालाबाजारी एवं तस्करी ये सब भ्रष्टाचार के मुख्य कारण है !

भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाये ?
भ्रष्टाचार कि जड़ों को उखाड़ने के लिए सबसे पहले ये आवश्यक है कि हम इसके दोषी तत्वों को ऐसी कड़ी से कड़ी सजा देन कि दूसरा भ्रष्टाचारी फिर से सिर ना उठा सके ! इसके लिए सबसे सार्थक और सहीं कदम होगा प्रशासन का सख्त और चुस्त होना , न केवल सरकार अपितु सभी सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं , समाज के ईमानदार , कर्ताव्यानिष्ट सच्चे सेवकों और मानवता एवं नैतिकता के पुजारियों को प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें पारितोषिक देकर भ्रष्टाचारियों के हीन मनोबल को प्रेरित करना चाहिए जिससे सच्चाई , कर्त्तव्य और कर्मठता कि वह दिव्य ज्योति जल सके जो भ्रष्टाचार के अंधकर को समाप्त करके सुन्दर प्रकश कर सके !!!

उपसंहार...
"हमारी कमजोरी ही हमारी ताकत होती है और हमारी सबसे बड़ी ताकत कभी कभी कमजोरी बन जाती है" दुसरे शब्दों में कहें अपनी कमजोरी को दूर कर अपनी ताकत बनायें ! जब भारतवर्ष आजाद हुआ उस समय देश कि स्थिति कानून और विधेयक बनाने कि अनुकूल नहीं थी फिर भी जैसे-तैसे बुद्धजीवियों ने यथा स्थिति कानून बना लिया परन्तु देश कि स्थिति स्वतंत्रता के लगभग 64 वर्ष बाद पूर्णतः परिवर्तित हो गयी है अब हमें नए कानून और अधिकारों कि आवश्यकता है , समय के अनुसार परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है लेकिन हमारे भ्रष्टा नेता और निति निर्धारक पुराने कानूनों कि आड़ में देश को खोखला कर रहें हैं और हम सभी मूक दर्शक बने देख रहें हैं , इसके अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है ! देश स्वतंत्र तो हो गया लेकिन अभी भी हम परतंत्रता सी आग में जल रहें हैं आम नागरिकों के पास अधिकारों कि कमी है यदि कानून में अधिकार दिये भी गये हैं तो कितने प्रतिशत लोगों को जानकारी है ? नहीं है जिसका लाभ प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर उठा रहा है !
संक्षेप में मैं ये कहूँ कि हम सभी किसी ना किसी स्तर पर भ्रष्ट हैं या जाने अनजाने भ्रष्ट्राचार को समर्थन दे रहे हैं अन्यथा भ्रष्टाचार इतना विकराल रूप धारण नहीं करता अब समय आ गया है कि खुद को हम बदलें !
क्यूँ कि "हम बदलेंगे -युग बदलेगा , हम सुधरेंगे युग सुधरेगा "

आपके नजरिये से भ्रष्टाचार कि श्रेणी में क्या क्या आते हैं बताएं ? ताकि हमें भ्रष्टाचार के सभी चेहरों का ज्ञान हो !!! आपके विचारों का इंतिज़ार होगा , जल्दी बताने का प्रयास करें ...
धन्यवाद..

1 comment:

  1. बन्दे की सोच सकारात्मक और मनन दूरगामी है.....आशा है और ईश्वर से ध्येय है की वो लोगों को इस परेशानियों से मुक्त कर शांति और सहस्पर्ता का प्रसार करे...

    "परमात्मन परब्रम्हे मम शरीरं पाहि कुरु कुरु स्वाहा".....
    कल्याण मस्तु...

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