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Wednesday, October 12, 2011

इसी बात का है मुझे गुरुर...


अजीब ख्यालात से
मन व्याकुल हुआ जा रहा है
जैसे स्कुल के प्रांगण
में तू खिल खिला रहा है
क्यूँ मेरी आंखे आज भी
तेरी झलक पाने को
बेताब हुये जा रहा है
तेरी शरारतों को
सोच कर लगता है
कल की ही तो बात है
सिर्फ आज ही तो
जुदाई की काली रात है
कल फिर सड़क से गुजरते
तू दिखेगा तो जरुर
तू मेरे घर के चक्कर लगता है
इसी बात का है मुझे गुरुर
हाँ यकीन है,
तुम्हारी नज़र खोजती है,
सिर्फ मुझे
पाने की दुआ करती हूँ,
मेरा जीवन अर्पण है
सिर्फ तुझे
बिछड़ के कैसे
जिंदगी जी सकुंगी तुमसे
सोच के
जिया कसमसा जाता है
बैचैनी रात भर तडपाती
और
इसी तरह
दिन निकल जाता है !!!

2 comments:

  1. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

    संजय कुमार
    आदत….मुस्कुराने की
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. yhan bhi ghmke aayen ...dhnywad

    http://www.catchmypost.com/index.php/hindi-corner/kavita/783-2011-10-19-20-36-54

    ReplyDelete

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