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Wednesday 19 October 2011

देश के लिए.....



जिंदगी जी सकूँ,
कुछ ऐसा ज्ञान दो
देश के लिए कुर्बान हो जाये,
ऐसी शान दो
गौरवन्वित हो मस्तक मेरा,
ऐसा कोई काम दो
जिन्दगी गुजरा संघर्षमय,
अब कुछ आराम दो

5 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया सर!
    ----
    कल 21/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. भाई मुकेश गिरी जी,
    सादर अभिवादन.
    आपके ब्लॉग में आके अच्छा लगा...
    अच्छा लिख रहे हैं आप... साधना जारी रहे....

    “मांग मत आराम के दो पल
    और बन सूरज दमकता चल”

    सादर

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  3. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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