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Thursday 8 December 2011

आत्म संतुष्टि ...


जाने क्यूँ रात-दिन,
अनजाने सपने सजाती हूँ !
आंख खुलते ही,
खुद से तुझे दूर पाती हूँ !
रोम-रोम में बसे हो,
जेहन में तुमको पाती हूँ !
नज़रों का धोका है ?
पर मन का विश्वास कर जाती हूँ !
उफ़ ये रिवाजों की बंदिशें क्यूँ,
तेरी बातों से आत्म संतुष्टि को पाती हूँ !

2 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. humesha ki tarah achchha likhna kya ye thik hoga ? nhi .................... tumne bahot achchha likha hai . aur humesha aisa hi likhte raho

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