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Wednesday, February 15, 2012

अब तलक तेरी खुशबु आती है...



जब लिखने बैठता हूँ तस्वीर तेरी आँखों में छा जाती है

मेरे शब्दों में तेरे शब्दों की झलक - छलक जाती है

मेरे लिखे पंक्तियों को छुप-छुपकर पढ़ा करती थी

जाने क्यूँ सामने आने से कतराती और डरा करती थी

सुनहली आँखों में अनसुलझे सपने बुना करती थी

सपनो की सच्चाई ज़ाहिर न हो हरसूं गुना करती थी

गुस्सा होता था चेहरे पर दिल में अरमान पनपाती थी

गुमनाम तन्हाइयों में मुझको करीब दिल के पाती थी

हाँ तेरी जुदाई का दर्द पल-पल नासूर हुए जाती है

किताबों में दफ़न फूलों से अब तलक तेरी खुशबु आती है

मुकेश गिरी गोस्वामी : हृदयगाथा
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8 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत है पोस्ट।

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    1. इमरान जी अन्य कविताओं पर भी निगाह घुमाएँ
      धन्यवाद

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  2. वाह
    बहूत सुंदर.
    मिठी सी याद का सुंदर वर्णन ....
    बेहतरीन रचना.....

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    1. रीना मौर्य जी, नमस्कार
      ब्लॉग पर आपका स्वागत है. कविता आपको पसंद आई..
      उम्मीद है निरंतर आपका आवागमन होता रहेगा..
      आपके वक्तव्या का हमेशा इन्तिज़ार रहेगा...
      धन्यवाद

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  3. हाँ तेरी जुदाई का दर्द पल-पल नासूर हुए जाती है

    किताबों में दफ़न फूलों से अब तलक तेरी खुशबु आती है
    BAHUT SUNDER RACHNA ...
    BADHAI EVAM SHUBHKAMNAYEN.

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    Replies
    1. अनुपमा जी नमस्कार
      आपको कविता पसंद आई
      सादर धन्यवाद
      हमेशा आप यहाँ आमंत्रित हैं

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