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Thursday 22 March 2012

विश्वास रखो माँ...



मेरे मासूम चेहरे से कोई,
नज़रें हटाते क्यूँ नही ?
मेरे बढ़ते हुये किताबों पर,
नज़रे डताते क्यूँ नहीं ?

किस्से मासूमियत के,
आप ही लोग बताते हो !
फिर क्यूँ भविष्य की चिंता,
में हमें सताते हो ?

मेरे कदमों की लडखडाहट से,
घबराते क्यूँ हो ?
क्या मैं पहले कभी,
चलते समय गिरा नही हूँ ?

विश्वास रखो माँ,
मेरे कदम लडखडाये कोई बात नहीं !
तेरे विश्वास, तेरे अरमान और मेरे सपने,
कभी नहीं लडखडायेंगे !


मुकेश गिरि गोस्वामी हृदयगाथा : मन की बातें

7 comments:

  1. वाकई शानदार, दिल को छु लेने वाली रचना हे गिरि जी

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    1. कमल जी नमस्कार
      सादर धन्यवाद एवं आभार

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  2. ढेर सारी शुभकामनाए:-)

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    Replies
    1. बहुत ही सुन्दर अभिव्यति है...

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  3. शानदार रचना ... एक माँ हूँ इसलिए समझ सकती हूँ .. :)

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  4. क्षितिजा जी भावनाओ को समझने से ही कविता सार्थक हो पाती है..
    आपको सहृदय धन्यवाद

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