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नई कवितायेँ ...

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Hindi

Thursday 21 November 2013

आज कि कुछ पंक्तियाँ ...


ख्वाबों को दफना कर , हकीकत को अपना लिया
हमने तुझे भूल कर , सपनो को तिलांजलि दिया

रहबर राह में मिलता तो है मगर बिछुड़ने के लिए
अपने - सपने तो होते हैं मगर बिखरने के लिए

यक़ीनन तुमने धोखा दिया है  इश्क़ में बा-अदब
मेरी वफ़ा के बदले दे दिया तुमने ऐसा सबब 


मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा : मन कि बातें 

Sunday 15 September 2013

तेरे दर पे ही तो ...


फलसफा-ये -इश्क में तबाही का मंजर देखा है,
दहकते अंगारों से मैंने ज़ख्मों को सका है 
वफ़ा की हसरत थी फिर भी दिल को टूटते देखा है
कैसे यकीं करूँ खुदायी पे तेरे ये खुदा 
तेरे दर पे ही तो सब लुटाते हुए देखा है

मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें

देखा एक ख्वाब...


क्या लिखूं तू बेवफा जो हो गयी है
झूट के बाज़ार कहाँ  खो गयी है
उम्मीद न थी की तू बेरहम होगी 
सोचा  था साथ  जन्मो तक दोगी 
मगर ख्वाब हकीकत से तोड़ दिया 
मेरी मुहब्बत  को धोका दे छोड़ दिया 
मौत से तो लड़ जीत आया मैं 
 फिर क्यूँ खुद से तुझको दूर पाया मैं
मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयागाथा -मन की बातें

Saturday 1 June 2013

मगर ये हो न सका ...


कभी ख़्वाब सजाया था कि,
तेरे जुल्फों में फूल गुलाब का लगायेंगे
मगर ये हो न सका ...

सपने बुने थे कि,
तेरे लिए चाँद -सितारे जमी में लायेंगे
मगर ये हो न सका ...
ऐसी हसरत थी कि
जब लौटूं घर को तेरा मुस्कुराता मुखड़ा सामने हो 
मगर ये हो न सका ...
जब भी नींद खुले कि 
तेरे मासूम सी खिलखिलाहट से सुबह हो
मगर ये हो न सका ...
अक्सर हम कसमे खाते थे कि
कभी आँखों में आसूं आने नही देंगे
मगर ये हो न सका ...
तुझे अकेले दर्द उठाने नही देंगे
कठिन डगर में साथ चलते जायेंगे
मगर ये हो न सका ...
तुम थाली खाने की लेकर आते कि 
औरो से नज़ारे चुरा चिकोटी काट जाया करती
मगर ये हो न सका ...
थाली में रोटियां जबरन परोस जाया करती
और रसोई से नज़रे मिलाया करती
मगर ये हो न सका ...
जब तुम थककर सो जाया करती
मैं तुम्हे जगाया करता
मगर ये हो न सका ...

जो गम हो या ख़ुशी हो 
हरदम तुझे समझाऊ गले लगाऊ
मगर ये हो न सका ...

मेरे खातिर सबसे लड़ जाती 
मुझसे घर में झगड़े लड़ाती
मगर ये हो न सका ...
कवितायेँ  लिखता मैं और
तुम शब्दों का सजाया करती 
मगर ये हो न सका ...
बोल मेरे हुआ करते 
और गीत तुम गाया करती 
मगर ये हो न सका ..
 
मगर ये हो न सका ...
मगर ये हो न सका ...

Thursday 23 May 2013

आँखों में अश्क दिए है....

 क्यूँ कर रहा हूँ मैं तुमसे अब भी प्यार
तुमने तडफाया,
तुमने दिल तोडा
तुमने रुलाया मेरी आँखों में अश्क दीये है
अब और कैसे भरोसा करूँ
अब कैसे मुस्कुराऊँ
तुमने जिंदगी से खुशियों को मिटा दिये  है
मुझे तन्हा कर दिया
  मुझको छोड़ दिया, दिल तोड़ दिये है
फिर भी
मैं तुमसे मुहब्बत करता हूँ
क्या मैं गुनाहगार हूँ ...?

मुकेश गिरि गोस्वामी "हृदयगाथा" : मन की बातें

Wednesday 24 April 2013

झूठी थी वो... झूठी थी वो



बेवफा वो हुई तो कोई बात नही 
उसके दिल में तो कोई जज्बात नही

झूठ के बूते उसके मकान की नीव टिकी है 
जो अनमोल थी , वो  बेमोल में बिकी है

झूठी थी वो, तड़फना उसका लाजमी है 
उसने देखा न आईना जो रुख पे बेवफ़ाई लिखी है

तन का सुख तो बाज़ारों मे भी बिकता है, 
मन का चोर उसके चेहरे पे भी दिखता है ,

वो  ऊँचे महलों की रानी तो बनती  है  
फिर क्यूँ, बाजारू लोगों से उसकी छनती है 


मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें 

Sunday 14 April 2013

सिर्फ तुमसे है ..

मेरी मुहब्बत, मेरे ख्वाब, मेरा प्यार, इकरार 
सिर्फ तुम से है ..

स्वीकार कर लो अब कि मेरी दुनिया, संसार 
सिर्फ तुम से है ..

किसी और से कैसे पूछें मेरे सवालों के जवाब,
 सिर्फ तुम से है ..


तुमको मालूम नहीं जुदाई का दर्द, मेरी तड़फ मेरी फरियाद
सिर्फ तुम से है ..


तुम साथ हो तो जिंदगी जन्नत है, मेरे रिश्ते कि  बुनियाद
सिर्फ तुम से है ..


गर टूट जाऊँ,बिखर जाऊँ तो समेंट लेना मुझे मेरी पहचान  
सिर्फ तुम से है ..

मेरे खुदा सिर्फ इतना बता दे उससे कि मेरी जान, मेरी शान
सिर्फ तुम से है..

तुम बिन जी ना सकूँगा मेरे दिल की साँस, मेरी धड़कन
सिर्फ तुम से है ..


मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें 




Wednesday 3 April 2013

कोई बात नहीं !!!


पहले तो रोज दीदार करती थी,
छिप-छिपकर आँखों से वार करती थी ,
अब यह हाल है कि,
ख़त से भी मुलाक़ात नहीं,
रातों के ख्वाब सुनाती थीं,
मुझे तुम दिन में,
उससे कहने को तुम्हे
क्या कोई बात नहीं !

मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें

Sunday 31 March 2013

आँखों में नमी थी....

सब से  छुपाकर  दर्द  में जो  वो  मुस्कुराया …
उसकी  हंसी  ने  तो  आज भी  मुझे  रुलाया ….

दिल से  उठ  रहा  था  दर्द  का  धुंआ …
चेहरा  बता  रहा  था  की  सब  कुछ  उसने लुटाया …

आवाज़  में  में धोका  था  आँखों  में  नमी  थी …
और  कह  रहा  था  के मैंने सब  कुछ  भुला  लिया …

जाने  क्या  उसको  मुझसे  थीं  शिकायतें …
तनहाइयों  के शहर  में  खुद  को  बसा  लिया …

खुद  वो  हमसे  बिछड़  कर  अधूरी सी  हो  गई   ….
मुझको   भीड़  में  भी  तन्हा  बना  दिया …

मुकेश गिरि गोस्वामी
हृदयगाथा : मन की बातें

Saturday 2 February 2013

इत्तेफ़ाक...इत्तेफ़ाक...इत्तेफ़ाक


तेरा मुझसे मिलना इत्तेफ़ाक था,

तुम से बिछड़ने का डर भी इत्तेफ़ाक है

तेरे साथ बिताया लम्हा भी इत्तेफ़ाक था,

तुमसे दूर रहने का गम भी इत्तेफ़ाक है 

तेरी निगाहों में डूब जाना इत्तेफ़ाक था,

तेरी नज़रों से ओझल हो जाना भी इत्तेफ़ाक है

तेरी बातों में खो जाना इत्तेफ़ाक था

तेरी बातों में रो जाना भी इत्तेफ़ाक है

तेरी वो बेरुखी तो इत्तेफ़ाक था 

तेरी मुहब्बत भी क्या इत्तेफ़ाक है


हृदयगाथा : मन की बातें

Sunday 27 January 2013

पगडंडियाँ ...




कभी हमने भी

"ख्वाब" देखे थे

कि तेरा

"हाथ" पकड़ कर

हम भी उस 

"पगडण्डी" से

गुजरेंगे और 

अपनी जिंदगी

"मुक्कमल" कर लेंगे

मगर वो ख्वाब 

"चकनाचूर" हो गए

हम उन 

"पगडंडियों"

से दूर हो गए

तेरी "चाहतों" से

दूर हो गए 

तेरे बिना 

"जीने" के लिए

मजबूर हो गए 

जब भी उन 

"पगडंडियों"

का ख्याल दिल में 

"संजोते" हैं

हम अपनी 

"अधूरी"

कहानी पर  रोते हैं 

मुकेश गिरि गोस्वामी  हृदयगाथा : मन कि बातें