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Sunday, March 31, 2013

आँखों में नमी थी....

सब से  छुपाकर  दर्द  में जो  वो  मुस्कुराया …
उसकी  हंसी  ने  तो  आज भी  मुझे  रुलाया ….

दिल से  उठ  रहा  था  दर्द  का  धुंआ …
चेहरा  बता  रहा  था  की  सब  कुछ  उसने लुटाया …

आवाज़  में  में धोका  था  आँखों  में  नमी  थी …
और  कह  रहा  था  के मैंने सब  कुछ  भुला  लिया …

जाने  क्या  उसको  मुझसे  थीं  शिकायतें …
तनहाइयों  के शहर  में  खुद  को  बसा  लिया …

खुद  वो  हमसे  बिछड़  कर  अधूरी सी  हो  गई   ….
मुझको   भीड़  में  भी  तन्हा  बना  दिया …

मुकेश गिरि गोस्वामी
हृदयगाथा : मन की बातें

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