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Sunday, September 15, 2013

तेरे दर पे ही तो ...


फलसफा-ये -इश्क में तबाही का मंजर देखा है,
दहकते अंगारों से मैंने ज़ख्मों को सका है 
वफ़ा की हसरत थी फिर भी दिल को टूटते देखा है
कैसे यकीं करूँ खुदायी पे तेरे ये खुदा 
तेरे दर पे ही तो सब लुटाते हुए देखा है

मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें

1 comment:

  1. बहुत खूब .... लाजवाब पंक्तियाँ ...

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