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Tuesday 8 March 2011

मुहब्बत में मर मिटने का दम...


रौशन था ये जहान जिस रौशनी से...
आज वो रौशनी ही नही तो जहाँ रोशन कहाँ ?
नज़रों का मिलन क्या हुआ...
मानों कि पुनर्जनम हुआ हो यहाँ...!
देख लिया हो आफ़ताब ने जैसे...
चाँद पूनम का ! होगा ऐसा कहाँ....?
चलो बनायें हम पाक--मुहब्बत का...
इक प्यारा सा जहाँ !
गिले शिकवे मिटा लें कर ले दोस्ती हम...
रिश्ता दोस्ती का होता नहीं कम...
पाना ही है तुमको खायी है कसम...
हम भी रखते हैं मुहब्बत में मर मिटने का दम !!!

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