
जाने क्यूँ रात-दिन,
अनजाने सपने सजाती हूँ !
आंख खुलते ही,
खुद से तुझे दूर पाती हूँ !
रोम-रोम में बसे हो,
जेहन में तुमको पाती हूँ !
नज़रों का धोका है ?
पर मन का विश्वास कर जाती हूँ !
उफ़ ये रिवाजों की बंदिशें क्यूँ,
तेरी बातों से आत्म संतुष्टि को पाती हूँ !
अनजाने सपने सजाती हूँ !
आंख खुलते ही,
खुद से तुझे दूर पाती हूँ !
रोम-रोम में बसे हो,
जेहन में तुमको पाती हूँ !
नज़रों का धोका है ?
पर मन का विश्वास कर जाती हूँ !
उफ़ ये रिवाजों की बंदिशें क्यूँ,
तेरी बातों से आत्म संतुष्टि को पाती हूँ !
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ReplyDeletehumesha ki tarah achchha likhna kya ye thik hoga ? nhi .................... tumne bahot achchha likha hai . aur humesha aisa hi likhte raho
ReplyDeletethanks anjali jee
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