
प्रेम कि नैया पार लगा दो,
सूखे ह्रदय में प्रेम क़ी सरिता बहा ही दो !
निगाहें मिला अपना बना दो,
चलो अब रेगिस्तान में कमल खिला ही दो !
अग्नि सरि की बुझा दो या
अब दरिया-ए-आग से तुम पार करा ही दो !
पपीहे की प्यास बुझती नहीं नदी-तालाबों से,
चलो अब स्नेह कि बारिश करा ही दो !
तन्हा चला हूँ राहे जिंदगी में,
चलो अब संग चलकर मेरी तन्हाई को मिटा ही दो !
जिंदगी की ख्वाहिश नहीं बिन तेरे,
चलो अब मुझे विष का प्याला पिला ही दो !
सूखे ह्रदय में प्रेम क़ी सरिता बहा ही दो !
निगाहें मिला अपना बना दो,
चलो अब रेगिस्तान में कमल खिला ही दो !
अग्नि सरि की बुझा दो या
अब दरिया-ए-आग से तुम पार करा ही दो !
पपीहे की प्यास बुझती नहीं नदी-तालाबों से,
चलो अब स्नेह कि बारिश करा ही दो !
तन्हा चला हूँ राहे जिंदगी में,
चलो अब संग चलकर मेरी तन्हाई को मिटा ही दो !
जिंदगी की ख्वाहिश नहीं बिन तेरे,
चलो अब मुझे विष का प्याला पिला ही दो !
अच्छा प्रयास है..परन्तु विषय का चयन उत्कृष्ट नहीं है कृपया कविता को दुसरे विषय में भी लिखने की कोशिश करें !
ReplyDeleteधन्यवाद !!!
भावपूर्ण प्रस्तुति.
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