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नई कवितायेँ ...

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Hindi

Saturday 26 March 2011

आज कुछ लिखने का मन हो रहा था दिल में कुछ असमंजस कि स्थिति बनी हुई थी.....कविता तो लिखते ही रहता हूँ पर आज कविता लिखने का मन नहीं हो रहा है....खैर .........शुरुवात मैं फेसबुक और ऑरकुट से करना चाहूँगा ..क्यूँ कि वेब कि दुनिया में यही दो नाम है जिसने मुझे आकर्षित किया वर्ना मैं गूगल सर्च से ही अपना काम चला लिया करता था.... मैं धन्यवाद करना चाहूँगा इनकी रचयिताओं का जिन्होंने अनोखा और अद्भुत अविष्कार किया इन्ही के कारण आज हम हजारों नहीं लाखों किलोमीटर दूर बैठे लोगों से जुड़ पायें हैं और अपने आचार-विचार बाँट रहें हैं !
इक दुसरे कि भावनाओ समस्याओं को जान और समझ रहें हैं......सोचता हूँ तो लगता है कि यदि सायबर युग नहीं आता तो आज भी हम सूचना सम्प्रेषण के लिए आदिम जमाने के नुस्के आजमाते रहते ....खैर जो होता है अच्छे के लिए होता है इस वाक्या पर विश्वास हो गया है...मैं शुक्रगुजार हूँ वेब युग के दुनिया का जिनके कारण मैंने कुछ बहुत अच्छे और विश्वसनीय दोस्त बना लिए हैं !

Wednesday 23 March 2011

प्रतीक्षा कि अगन...



विरह के वेदना में मैं क्यूँ जल रहा हूँ ,
मौत के आगोश में मैं जैसे पल रहा हूँ !
प्रतीक्षा कि अग्नि में जल रहा हूँ ,
फिर भी अंगारे जिस्म में मल रहा हूँ !
कौन है कैसी है वो..? सपने नए बुन रहा हूँ ,
भीड़ के कोलाहल में भी मधुर तान उसकी सुन रहा हूँ ,
धडकनों कि थाप पे मिलन कि घड़ियाँ गिन रहा हूँ !
खाली है दामन फिर भी खुशियाँ मैं तेरे लिए चुन रहा हूँ ,
अनजानी हो या पहचानी सोच असमंजस में गुन रहा हूँ !
किसका इन्तिज़ार है..? समझ नहीं पा रहा हूँ ,
बस इन्तिज़ार ही इन्तिज़ार किये जा रहा हूँ !

Saturday 19 March 2011

होली एवं बसंत पंचमी त्यौहार ...


सबसे पहले आप सभी को होली (बसंत पंचमी) एवं घुडेली त्यौहार कि हार्दिक शुभकामनायें...

आज होलिका पर्व है मैंने सोचा कि ब्लॉग पर आज होली पर्व कि जानकारी जुटाए जाये जिस से लोग थोडा और जानकारी पा सकें , वैसे हिंदुस्तान में ऐसा कोई नहीं होगा जो इस पर्व के विषय में जानता हो..? फिर भी मैंने अपने ब्लॉग पर ये जानकारी लिखने का मन बनाया ....पढ़िए शायद कोई नयी जानकारी आप तक पहुचने के इन्तिज़ार में हो ... है ना .........
होली...?
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।

राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली

इतिहास...

इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।

सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।

कहानियाँ...

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।

प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।

परंपराएँ...
होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। । वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।
होलिका दहन

होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए। व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।
सार्वजनिक होली मिलन

होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता ।

विशिष्ट उत्सव...
भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया, जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

पुनः होली कि ढेर सारी शुभकामनायें ..........
धन्यवाद !!!

आपका अपना रंगबिरंगी ...
मुकेश गिरी गोस्वामी

Wednesday 16 March 2011

तुमसे कभी रोया न गया ......




प्यार मुझको भी था तुमको भी था ,
तुमने कहा नहीं और हम भी कह ना सकें !

गम और दर्द में भी मुस्कुराना पड़ता था,
तुमसे कभी रोया न गया और हम भी रो न सकें !

तुमसे ही घर कि आबरू और तुमसे ही मर्यादा था,
दर्द तडफ था सीने में पर परम्परा निभाने का वादा था !

मोहब्बत तो करते हैं पर प्रेम तुमको मुझसे ज्यादा था,
लगता है जैसे हमने संस्कारों को खुद पर ही लादा था !

सुन्दर परियों के बीच में भी तुम्हारा मुखड़ा मुझको भाता था,
देख के तुमको दिल में आवाज़ थी उठती कई जन्मो का नाता था !

चली गयी जब से परदेश को तुम गीत विरह के मैं गाता हूँ,
सुना है शहर तेरा सुनी है गलियां फिर भी चक्कर मैं लगता हूँ !

ना कभी बहका हूँ ना कभी लडखडाया हूँ,
फिर तुमने क्यूँ पिलाने में कमी की है !

सिर्फ तेरी मुहब्बत को पाने के लिए मैंने,
कभी आसमां को ज़मी तो कभी ज़मीं को आसमां की है !

Thursday 10 March 2011

प्रेम प्रतिज्ञा..



मुस्काती है वो बच्चो की तरह मंद-मंद है...
केवल इस संसार में मुझे वह पसंद है
शची जैसी लगती हो, किंचित आकाश है...
सच कहता हूँ यह हमारा इतिहास है...
रिवाज है जो वही होगा, कौन कहता है...
तामरस हो तुम ,
...................... तुम्हें नहीं छोड़ सकता ऐसा मेरा मुख कहता है

Tuesday 8 March 2011

मुहब्बत में मर मिटने का दम...


रौशन था ये जहान जिस रौशनी से...
आज वो रौशनी ही नही तो जहाँ रोशन कहाँ ?
नज़रों का मिलन क्या हुआ...
मानों कि पुनर्जनम हुआ हो यहाँ...!
देख लिया हो आफ़ताब ने जैसे...
चाँद पूनम का ! होगा ऐसा कहाँ....?
चलो बनायें हम पाक--मुहब्बत का...
इक प्यारा सा जहाँ !
गिले शिकवे मिटा लें कर ले दोस्ती हम...
रिश्ता दोस्ती का होता नहीं कम...
पाना ही है तुमको खायी है कसम...
हम भी रखते हैं मुहब्बत में मर मिटने का दम !!!

Tuesday 1 March 2011

सिर्फ तेरा ही नाम है...



नींद नहीं आँखों में...!
चैन नहीं सांसो में...!
किस तरह से जिया जाये...!
मन कि तृष्णा कहे हाये...!
चारो ओर नशे का उन्माद है...!
जिंदगी इनकी बर्बाद है...!
मिट रहा है प्रेम प्यारा...!
खो गया है भाई चारा...!
कोई तो आओ सम्हल लो...!
डूबते नाव को तार लो...!
बेखुदी को मार लो...!
जिंदगी संवार लो...!
ढल रही जिंदगी कि शाम है...!
शराबखोरी आम है...!
सिरदर्द के लिए बाम है...!
जिंदगी के लिए जाम है ..?
और ना इन्हें कोई काम है...!
बेपरवाहों के लिए हसीं शाम हैं..?
न्यूज़ पपेरों में खूनियों का नाम है...!
लुट मार कि खबरें चैनलों कि शान है...!
प्रभु हम दुखियों के लिए सिर्फ तेरा ही नाम है...!
हमें बुराइयों से बचाना तेरा ही काम है...!
तेरा ही आसरा हमें ...!
तुझको ही प्रणाम है ...!

भारत माता का गीत सौजन्य से :-



भारत माता की जय !!

भाल रचे कुंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाये।
राष्ट्र के गीत बसें मन में, उर राष्ट्र के ज्ञान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पाँव सदा, नैनों में विशाल गगन लहराए।
गंगा यमुना शुचि नदियों ने, मणि मुक्ता हार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश जहां, हरियाली जिसकी मन भाये ।
भारत माँ शुभ्र ज्योत्सनामय, सब जग के मन को हरषाये।

हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया।
उगता रवि जब इस आँगन में, लगता सोना है बिखराया।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सज़ी, दो सुन्दर बाहों युत काया।
वो पुरुष पुरातन विन्ध्याचल, कटि- मेखला बना हरषाया ।
कण कण में शूर वीर बसते, नस नस में शौर्य भाव छाया।
हर तृण ने इसकी हवाओं के, शूरों का परचम लहराया ।

इस ओर उठाये आँख कोई, वह शीश न फिर उठ पाता है।
वह दृष्टि न फिरसे देख सके, जो इस पर जो दृष्टि गढ़ाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व शान्ति हित के नायक, यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान ध्वजा, नित नित फहराता जाता है।

इतिहास बसे अनुभव संबल, मेधा बल वेद ऋचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे, चल दिया पुनः नव राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर, विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण, फैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें, इस देश की कला कथाओं में।
ललचाते देव, मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में।