Saturday, June 1, 2013

मगर ये हो न सका ...


कभी ख़्वाब सजाया था कि,
तेरे जुल्फों में फूल गुलाब का लगायेंगे
मगर ये हो न सका ...

सपने बुने थे कि,
तेरे लिए चाँद -सितारे जमी में लायेंगे
मगर ये हो न सका ...
ऐसी हसरत थी कि
जब लौटूं घर को तेरा मुस्कुराता मुखड़ा सामने हो 
मगर ये हो न सका ...
जब भी नींद खुले कि 
तेरे मासूम सी खिलखिलाहट से सुबह हो
मगर ये हो न सका ...
अक्सर हम कसमे खाते थे कि
कभी आँखों में आसूं आने नही देंगे
मगर ये हो न सका ...
तुझे अकेले दर्द उठाने नही देंगे
कठिन डगर में साथ चलते जायेंगे
मगर ये हो न सका ...
तुम थाली खाने की लेकर आते कि 
औरो से नज़ारे चुरा चिकोटी काट जाया करती
मगर ये हो न सका ...
थाली में रोटियां जबरन परोस जाया करती
और रसोई से नज़रे मिलाया करती
मगर ये हो न सका ...
जब तुम थककर सो जाया करती
मैं तुम्हे जगाया करता
मगर ये हो न सका ...

जो गम हो या ख़ुशी हो 
हरदम तुझे समझाऊ गले लगाऊ
मगर ये हो न सका ...

मेरे खातिर सबसे लड़ जाती 
मुझसे घर में झगड़े लड़ाती
मगर ये हो न सका ...
कवितायेँ  लिखता मैं और
तुम शब्दों का सजाया करती 
मगर ये हो न सका ...
बोल मेरे हुआ करते 
और गीत तुम गाया करती 
मगर ये हो न सका ..
 
मगर ये हो न सका ...
मगर ये हो न सका ...

Thursday, May 23, 2013

आँखों में अश्क दिए है....

 क्यूँ कर रहा हूँ मैं तुमसे अब भी प्यार
तुमने तडफाया,
तुमने दिल तोडा
तुमने रुलाया मेरी आँखों में अश्क दीये है
अब और कैसे भरोसा करूँ
अब कैसे मुस्कुराऊँ
तुमने जिंदगी से खुशियों को मिटा दिये  है
मुझे तन्हा कर दिया
  मुझको छोड़ दिया, दिल तोड़ दिये है
फिर भी
मैं तुमसे मुहब्बत करता हूँ
क्या मैं गुनाहगार हूँ ...?

मुकेश गिरि गोस्वामी "हृदयगाथा" : मन की बातें

Wednesday, April 24, 2013

झूठी थी वो... झूठी थी वो



बेवफा वो हुई तो कोई बात नही 
उसके दिल में तो कोई जज्बात नही

झूठ के बूते उसके मकान की नीव टिकी है 
जो अनमोल थी , वो  बेमोल में बिकी है

झूठी थी वो, तड़फना उसका लाजमी है 
उसने देखा न आईना जो रुख पे बेवफ़ाई लिखी है

तन का सुख तो बाज़ारों मे भी बिकता है, 
मन का चोर उसके चेहरे पे भी दिखता है ,

वो  ऊँचे महलों की रानी तो बनती  है  
फिर क्यूँ, बाजारू लोगों से उसकी छनती है 


मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें 

Sunday, April 14, 2013

सिर्फ तुमसे है ..

मेरी मुहब्बत, मेरे ख्वाब, मेरा प्यार, इकरार 
सिर्फ तुम से है ..

स्वीकार कर लो अब कि मेरी दुनिया, संसार 
सिर्फ तुम से है ..

किसी और से कैसे पूछें मेरे सवालों के जवाब,
 सिर्फ तुम से है ..


तुमको मालूम नहीं जुदाई का दर्द, मेरी तड़फ मेरी फरियाद
सिर्फ तुम से है ..


तुम साथ हो तो जिंदगी जन्नत है, मेरे रिश्ते कि  बुनियाद
सिर्फ तुम से है ..


गर टूट जाऊँ,बिखर जाऊँ तो समेंट लेना मुझे मेरी पहचान  
सिर्फ तुम से है ..

मेरे खुदा सिर्फ इतना बता दे उससे कि मेरी जान, मेरी शान
सिर्फ तुम से है..

तुम बिन जी ना सकूँगा मेरे दिल की साँस, मेरी धड़कन
सिर्फ तुम से है ..


मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें 




Wednesday, April 3, 2013

कोई बात नहीं !!!


पहले तो रोज दीदार करती थी,
छिप-छिपकर आँखों से वार करती थी ,
अब यह हाल है कि,
ख़त से भी मुलाक़ात नहीं,
रातों के ख्वाब सुनाती थीं,
मुझे तुम दिन में,
उससे कहने को तुम्हे
क्या कोई बात नहीं !

मुकेश गिरि गोस्वामी : हृदयगाथा मन की बातें

Sunday, March 31, 2013

आँखों में नमी थी....

सब से  छुपाकर  दर्द  में जो  वो  मुस्कुराया …
उसकी  हंसी  ने  तो  आज भी  मुझे  रुलाया ….

दिल से  उठ  रहा  था  दर्द  का  धुंआ …
चेहरा  बता  रहा  था  की  सब  कुछ  उसने लुटाया …

आवाज़  में  में धोका  था  आँखों  में  नमी  थी …
और  कह  रहा  था  के मैंने सब  कुछ  भुला  लिया …

जाने  क्या  उसको  मुझसे  थीं  शिकायतें …
तनहाइयों  के शहर  में  खुद  को  बसा  लिया …

खुद  वो  हमसे  बिछड़  कर  अधूरी सी  हो  गई   ….
मुझको   भीड़  में  भी  तन्हा  बना  दिया …

मुकेश गिरि गोस्वामी
हृदयगाथा : मन की बातें

Saturday, February 2, 2013

इत्तेफ़ाक...इत्तेफ़ाक...इत्तेफ़ाक


तेरा मुझसे मिलना इत्तेफ़ाक था,

तुम से बिछड़ने का डर भी इत्तेफ़ाक है

तेरे साथ बिताया लम्हा भी इत्तेफ़ाक था,

तुमसे दूर रहने का गम भी इत्तेफ़ाक है 

तेरी निगाहों में डूब जाना इत्तेफ़ाक था,

तेरी नज़रों से ओझल हो जाना भी इत्तेफ़ाक है

तेरी बातों में खो जाना इत्तेफ़ाक था

तेरी बातों में रो जाना भी इत्तेफ़ाक है

तेरी वो बेरुखी तो इत्तेफ़ाक था 

तेरी मुहब्बत भी क्या इत्तेफ़ाक है


हृदयगाथा : मन की बातें

Sunday, January 27, 2013

पगडंडियाँ ...




कभी हमने भी

"ख्वाब" देखे थे

कि तेरा

"हाथ" पकड़ कर

हम भी उस 

"पगडण्डी" से

गुजरेंगे और 

अपनी जिंदगी

"मुक्कमल" कर लेंगे

मगर वो ख्वाब 

"चकनाचूर" हो गए

हम उन 

"पगडंडियों"

से दूर हो गए

तेरी "चाहतों" से

दूर हो गए 

तेरे बिना 

"जीने" के लिए

मजबूर हो गए 

जब भी उन 

"पगडंडियों"

का ख्याल दिल में 

"संजोते" हैं

हम अपनी 

"अधूरी"

कहानी पर  रोते हैं 

मुकेश गिरि गोस्वामी  हृदयगाथा : मन कि बातें 

Sunday, November 18, 2012

मेरी कहानी जिन्दा रहेगी ...

जिंदगी में जब भी,
तुम्हारे "साथ" की
जरुरत होती है
हरसूं क्यूँ तुम,
मुझसे "अगणित"
अनंत दूर होती है
तेरे "कोमल"
शब्दों की ध्वनी से,
मन "तनाव" रहित
हो जाता है
जब तुम
"किलकारियां" लगाती हो
किसी बच्चे की तरह
मेरे "होंटों" में
अजब "संतुष्टि" भरा
"मुस्कान" स्वतः ही
आ जाता है
तेरी "दुरी" मुझे
इतना क्यूँ सताता है
मन "अधीर" हो जाता है
बहुत तडफाता है
हर "लम्हा" तेरे आने का
 "ख्वाब" ये सजाता
फिर भी तुम
क्यूँ नही आती
क्यूँ मुझे नही अपनाती
शायद "तुम्हे" भी
इन्तिज़ार है मेरी "मईयत"  का
मैं तो "दफ़न" हो जाऊंगा
उम्मीदे मेरी
"जिन्दा" रहेगी
जब भी किसी "नादाँ" की
बात चलेगी
तेरे "लबों" में
मेरी "कहानी" जिन्दा रहेगी

मुकेश गिरि गोस्वामी : मन की बातें

Wednesday, November 14, 2012

दीपावली ...दीपावली ...दीपावली

दीपावली  : लो फिर  हम सब ने दिवाली बड़े धूम धाम , उल्लास पूर्ण मना लिया है , एक दुसरे को बधाई दे दी और स्वीकार ली। दिवाली गुजर जाने पर फिर वही भागमभाग व्यस्ततम जीवन हम पर हावी होने लगी।।
वर्षों से मैंने दिवाली पर्व नहीं मनाया कई साल पहले मेरे मन में एक सवाल उपजा की आखिर हम दिवाली मनाते क्यूँ हैं और इस पर्व को मनाने  से लाभ क्या है ? प्रतिवर्ष दीपावली पर्व में हम लाखो-करोडो नहीं नहीं शायद  अरबो-खरबों रुपये इन दिनों में खर्च कर देते हैं बेशक हमें खुशियाँ प्राप्त होती है, और मन को तसल्ली होती होगी की पड़ोसियों से हमने ज्यादा सामान ख़रीदा , हमारा मकान  ज्यादा बढ़िया सजा हुआ था इत्यादि इत्यादि ...  एक पल के लिए सोचिये की हम सभी भारतीय दिवाली में इतने पैसे खर्च कर देते हैं यदि इन पैसों का 20% भी हम देश हित में समर्पित करते तो क्या लाभ होता कितने गरीबो को भोजन प्राप्त होता, कितने केंसर या गंभीर रोगियों का इलाज संभव हो पता, कितने अनाथ - असहाय लोगों को सहारा मिल पाता ? यदि इतने पैसे देश के विकास में खर्च होते तो भारत का हर गाँव सिंगापूर होता, हमारे मोहल्ले के सड़कों में गन्दगी नही बहते होती, हर गली में सड़कों का निर्माण हो जाता , देश के एक भाग से दुसरे भाग को जोड़ने वाली राष्ट्रीय राज मार्ग की हालत खस्ता न होती, रेलवे और हवाई सेवा बेहतर से बेहतरीन होता परन्तु दुर्भाग्य की बात इस तरफ हम अपना योगदान नहीं दे पाते देश क़र्ज़ में डूब रहा है , गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और अमीर अमीरी के रिकॉर्ड तोड़ते जा रहे हैं, आम भारतीय एक अजीब से असंतुष्टि और घुटन से ग्रसित होता जा रहा है,
फिर भी हम भारतीय विभिन्न तरह के त्योहारों में अपने वार्षिक आमदनी के एक बड़ा हिस्सा फिजूल खर्ची में लुटा देते हैं ... क्या हम आज एक संकल्प लेने का पुरुषार्थ रखते हैं की आज से प्रत्येक त्योहारों में हम फिजूल खर्ची बंद कर प्रेम, ख़ुशी, उमंग, उल्लास, सदभावना, सहयोग को अधिक खर्च कर के भारतीय त्योहारों को अधिक गौरवशाली, आकर्षक मानाने का प्रयास करें।
इस लिए मैंने दिवाली में फिजूल खर्ची बंद कर दी है क्या आप भी ऐसा कर सकते हैं ?
जय हिन्द जय भारत
मुकेश गिरि गोस्वामी